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जहाँ ताली वहाँ गाली

वाह कैसी रे दुनिया,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 

राहो पे राह नहीं ,
साँसों में सांस नहीं ,
पेड़े पे पत्तियां नहीं ,
नदियों में पानी नहीं ,

वाह कैसी रे दुनिया ,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 
|

चहक ने को चिड़िया नहीं ,
नाचने को मोर नहीं ,
गाने को कोयल नहीं ,
उड़ने को आकाश नहीं ,

वाह कैसी रे दुनिया,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 

धार्मिक में धर्म नहीं ,
पंडित में ज्ञान नहीं ,
साधु ने साधा नहीं ,
सच्च  को  जाना नहीं ,

वाह कैसी रे दुनिया ,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 

कपड़ो में गाँधी नहीं ,
कहानियों में राम नहीं ,
गानो में कबीर नहीं ,
खानों में शबरी नहीं ,

वाह कैसी रे दुनिया ,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 

बच्चों का बच्पन नहीं ,
जवानी को समय नहीं ,
बूढ़ो को घर नहीं ,
मरने को घाट नहीं ,

वाह कैसी रे दुनिया ,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 

नेताओं से उम्मीद नहीं ,
दवाईओं के पैसे नहीं ,
सच्चे लेख नहीं ,
गुरु की कोई सुनता नहीं ,

वाह कैसी रे दुनिया ,
जहाँ ताली वहाँ  गाली  || 

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Introspection Practice

Chapter 10: The Human Goal: Moksha - Story of Kotikarna

Bhikshu Kotikarna mentioned that Moksha is to understand your true nature. (अपने असली स्वरूप को पहचानना ही मोक्ष है।). However, for a majority of us the question would remain as beautifully asked by the student in Vivekachoodamani: भ्रमेणाप्यन्यथा वाऽस्तु जीवभावः परात्मनः तदुपाधेरनादित्वान्नानादेनार्श इष्यते॥ अतोस्य जीवभावोऽपि नित्या भवति संसृतिः न निवर्तेत तन्मोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद॥ [- १९२ & १९३] bhrameṇāpyanyathā vā'stu jīvabhāvaḥ parātmanaḥ tadupādheranāditvānnānādenārśa iṣyate. atosya jīvabhāvo'pi nityā bhavati saṁsṛtiḥ na nivarteta tanmokṣaḥ kathaṁ me śrīguro vada. [192 & 193] That the Supreme Self has come to consider itself as the jiva, through delusion or otherwise, is a superimposition which is beginning less. That which is beginning less cannot be said to have an end ! So the jiva-hood of the Self must also be without an end, ever subject to transmigration. Please tell me, O revered Teacher, how then can there be 'moksha' (liberation) for the Self? ...

फकीरों से उनकी जात नहीं पूछा करतें हैं

फकीरों से उनकी जात नहीं पूछा करतें हैं ||  दुनियाँ में लोग खुशियां खोजा करते हैं |  फ़क़ीर अपने आप मैं डुबा करतें हैं ||  तुलसी से उनके राम नहीं पूछा करतें हैं |  फकीरों से उनकी जात नहीं पूछा करतें हैं ||  लोग अपने आप पे बड़ा गुमान किया करतें हैं |  फ़क़ीर सब कुछ लुटाकर बैठा करतें हैं ||  कबीर से उनका काम नहीं पूछा करतें हैं |  फकीरों से उनकी जात नहीं पूछा करतें हैं | |  मूर्ख "तुम्हें पता हैं मैं कौन हूँ " कहाँ करतें हैं |  फ़क़ीर "बुल्ला की जाने मैं कौन " कहाँ करतें हैं ||  बुल्ला  से उनके यार नहीं पूछा करतें हैं |  फकीरों से उनकी जात नहीं पूछा करतें हैं ||  धमकी "फलानो को लेके आएंगे " की दिया करतें हैं |  फकीरों को डराया मत करो, वो अपनी भी परवाह नहीं किया करतें हैं ||  कृष्ण से उनकी सेना नहीं पूछा करतें हैं |  फकीरों से उनकी जात नहीं पूछा करतें हैं ||  धर्म और ज्ञान को लेकर हम लड़ा करतें हैं |  फ़क़ीर तो अपना सर कटाकर बैठा करतें हैं ||  मीराँ से उनकी ...